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Showing posts with the label सफलता की कहानियाँ

गिरीश शर्मा " सफलता की कहानी "

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जिनके अंदर सफल होने की हसरत हो और संघर्ष का हौसला जीवन में कभी भी कुछ भी उनके लिए असंभव नहीं रहता ऐसी ही एक कहानी गिरीश शर्मा की है बचपन में ही अपना एक पैर गवाने के बाद भी उन्हें कभी अपने आप को कमजोर लाचार नहीं समझा और हमेशा सामान्य आदमी की तरह अपने जीवन को जीने का प्रयास किया और उसमें सफलता भी पाई है। आज उन्हीं की कहानी सफलता की कहानी आइए पढ़ते हैं । गिरीश शर्मा " सफलता की कहानी " कहते हैं :- कदम निरंतर चलते जिनके, श्रम जिनका अविराम है। विजय सुनिश्चित होती उनकी, घोषित यह परिणाम है। यह पंक्तियां गिरीश शर्मा के ऊपर पूर्ण रुप से लागू होती है आपने बचपन से ही निरंतर अथक मेहनत कि और संघर्षपूर्ण जीवन से वह सफलता हासिल की जो आज एक सामान्य आदमी भी नहीं कर सकता है। इंसान जिंदगी में कुछ अच्छा करना चाहता है,सफलता पाना चाहता है लेकिन सफलता ना पाने के पीछे उसका कोई ना कोई बहाना होता है हर एक इंसान के अंदर कोई ना कोई कमजोरी होती है और वही कमजोरी उसके बहाने का रुप ले लेती है.आज मैं आपको जिस इंसान के बारे में बताने वाला हूं उसके बारे में जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे क्योंकि उनके पास एक ...

हेलन केलर " सफलता की कहानी "

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कहते हैं जब सारे  दरवाजे बंद हो जाते हैं तो भगवान एक खिड़की खोल देता है , लेकिन अक्सर हम बंद हुए दरवाजे की ओर इतनी देर तक देखते रह जाते हैं कि खुली हुई खिड़की की ओर हमारी दृष्टी भी नही जाती। ऐसी परिस्थिति में जो अपनी दृण इच्छाशक्ति से असंभव को संभव बना देते हैं, वो अमर हो जाते हैं।दृण संकल्प वह महान शक्ति है जो मानव की आंतरिक शक्तियों को विकसित कर प्रगति पथ पर सफलता की इबारत लिखती है। मनुष्य के मजबूत इरादे दृष्टीदोष, मूक तथा बधिरता को भी परास्त कर देते हैं। अनगिनत लोगों की प्रेरणा स्रोत, नारी जाति का गौरव मिस हेलेन केलर शरीर से अपंग पर मन से समर्थ महिला थीं। उनकी दृण इच्छा शक्ति ने दृष्टीबाधिता, मूक तथा बधिरता को पराजित कर नई प्रेरणा शक्ति को जन्म दिया। हेलन केलर " सफलता की कहानी " 27 जून 1880 को जन्म लेने वाली ये बालिका 6 महिने में घुटनो चलने लगी और एक वर्ष की होने पर बोलने लगी। जब 19 माह की हुईं तो एक साधारण से ज्वर ने हँसती-खेलती जिंदगी को ग्रहण लगा दिया। ज्वर तो ठीक हो गया किन्तु उसने हेलन केलर को दृष्टीहीन तथा बधिर बना दिया। सुन न सकने की स्थिती में बोलना भी असंभव ह...

श्रीकांत बोला "सफलता की कहानी

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श्रीकांत बोला "सफलता की कहानी " हौसला हो तो क्या नहीं पाया जा सकता। इंसान में सच्ची प्रतिभा होनी चाहिए, बस फिर कोई भी कठिनाई उसका रास्ता या उसके बुलंद हौसलों को मात नहीं दे सकती। यहां हम बात कर रहे हैं एक ऐसे शख्स की, जिसने अपने जज़्बे को कायम रखा और अपनी मंज़िल को पाने का रास्ता बनाया और उसे हासिल भी किया। श्रीकांत बोला जो बचपन से ही ब्लाइंड हैं, आज 50 करोड़ रुपए की कंज्यूमर फूड पैकेजिंग कंपनी बौलेंट इंडस्ट्रीज के CEO के पद पर नियुक्त हैं। उन्होंने यह कंज्यूमर फूड पैकेजिंग कंपनी बनाकर कई लोगों के लिए एक मिसाल कायम की है। हैदराबाद के श्रीकांत बोला का बचपन कई कठिनाइयों से गुजरा। उनके परिवार की मासिक आय लगभग 1,600 रुपए थी। आपको ये जानकार हैरत होगी कि जब श्रीकांत का जन्म हुआ, तो उनके कुछ रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने श्रीकांत के माता-पिता को उनके पैदा होते ही उन्हें मार देने को कहा था। लेकिन श्रीकांत की किस्मत में कुछ और ही था। किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है, जो खुद पर भरोसा और अपनी मेहनत से कुछ कर दिखाने का दम रखते हैंं। श्रीकांत बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। परिवार की आर्थिक...

विल्मा रुडोल्फ " सफलता की कहानी "

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विल्मा रुडोल्फ " सफलता की कहानी " विल्मा का जन्म अमेरिका के एक गरीब परिवार में हुआ था। वह एक अश्वेत परिवार में जन्मी थीं। उस समय अश्वेत लोगों को दोयम दर्जे का इंसान माना जाता था। उनकी माँ नौकरानी का काम करती थीं। और पिता कुली का काम करते थे। बचपन में विल्मा के पैर में बहुत दर्द रहता। इलाज करने के बाद पता चला कि विल्मा को पोलियो हुआ है। उनका परिवार बहुत गरीब था। फिर भी ये माँ की हिम्मत और जज्बा ही था, जिसने विल्मा को कभी हारने नहीं दिया। अश्वेतों को उस समय सारी सहूलतें नहीं दी जाती थीं। इसी कारण विल्मा की माँ को उसके इलाज के लिए 50मील दूर ऐसे अस्पताल में ले जाना पड़ता था, जहाँ अश्वेतों का इलाज किया जाता था। वो सप्ताह में एक दिन अस्पताल जाती थीं। और बाकी के दिन घर पर ही इलाज होता था। पांच साल के इलाज के बाद विल्मा कि हालत में कुछ कुछ सुधार होने लगा। धीरे-धीरे विल्मा केलिपर्स के सहारे चलने लगी। विल्मा का इलाज करने वाले डॉक्टरों ने विल्मा कि माँ को जवाब दे दिया, कि अब विल्मा कभी बिना सहारे के नहीं चल पाएगी। पर कहते हैं न, कि जब मन में ठान ली जाये तो चट्टानों को भी गिरा...

लुई ब्रेल "सफलता की कहानी

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लुई ब्रेल "सफलता की कहानी " दृष्टीबाधितों के मसीहा एवं ब्रेल लिपि के आविष्कारक लुई ब्रेल का जन्म फ्रांस के छोटे से गाँव कुप्रे में हुआ था । 4 जनवरी 1809 को मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में लुई ब्रेल की आँखों की रोशनी महज तीन साल की उम्र में एक हादसे के दौरान नष्ट हो गई। परिवार में तो दुःख का माहौल हो गया क्योंकि ये घटना उस समय की है जब उपचार की इतनी तकनीक इजात नही हुई थी जितनी कि अब है। बालक लुई बहुत जल्द ही अपनी स्थिती में रम गये थे। बचपन से ही लुई ब्रेल में गजब की क्षमता थी। हर बात को सीखने के प्रति उनकी जिज्ञास को देखते हुए, चर्च के पादरी ने लुई ब्रेल का दाखिला पेरिस के अंधविद्यालय में करवा दिया। बचपन से ही लुई ब्रेल की अद्भुत प्रतिभा के सभी कायल थे। उन्होने विद्यालय में विभिन्न विषयों का अध्यन किया। कहते हैं ईश्वर ने सभी को इस धरती पर किसी न किसी प्रयोजन हेतु भेजा है। लुई ब्रेल की जिन्दगी से तो यही सत्य उजागर होता है कि उनके बचपन के एक्सीडेंट के पीछे ईश्वर का कुछ खास मकसद छुपा हुआ था। 1825 में लुई ब्रेल ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में एक ऐसी लिपि का आविष्कार कर दिया जिसे ...